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                                                                                                    बेटी हूँ मै  मौत आई है मुझे कई बार एक बार नहीं सौ बार।  कभी मारा मुझे समाज ने , तो कभी उन्ही के रिवाज ने।  कभी मरी हूँ मै "दहेज़" के जहर से, तो जली कभी उसी के केहर से।  बाप ने कभी दुनिया दिखा के मारा, तो मारा कभी माँ की कोख में।  आड़ ली मौत ने कभी मर्दानगी की  तो छुपी कभी एक तरफ़ा चाहत की चादर में।  ज़िंदा रह कर भी मरी हूँ मै।  जब बानी थी शिकार किसी के हवस की।  जलाया गया कभी मुझे सती बनाकर  तो दी गयी मौत मुझे कभी निर्भया बनाकर।  मरी उस पल भी थी। जब हर लिया था चीर मेरा  और मरी उस पल भी जब बिक गया शरीर मेरा।  ...