बेटी हूँ मै 



मौत आई है मुझे कई बार
एक बार नहीं सौ बार। 

कभी मारा मुझे समाज ने ,
तो कभी उन्ही के रिवाज ने। 

कभी मरी हूँ मै "दहेज़" के जहर से,
तो जली कभी उसी के केहर से। 



बाप ने कभी दुनिया दिखा के मारा,
तो मारा कभी माँ की कोख में। 

आड़ ली मौत ने कभी मर्दानगी की 
तो छुपी कभी एक तरफ़ा चाहत की चादर में। 

ज़िंदा रह कर भी मरी हूँ मै। 
जब बानी थी शिकार किसी के हवस की। 



जलाया गया कभी मुझे सती बनाकर 
तो दी गयी मौत मुझे कभी निर्भया बनाकर। 

मरी उस पल भी थी। जब हर लिया था चीर मेरा 
और मरी उस पल भी जब बिक गया शरीर मेरा। 


मौत आयी मेरी पहचान को भी। 
मौत आयी मेरी मुस्कान को भी। 
और मौत आयी मेरी उड़ान को भी। 
मौत आती रही में मरती रही। 
वह मारती रही में सहती रही। 

पूछ लिया एक बार मैंने मौत से। 
की हर बार मरती में ही क्यों  हूँ। 

वह भी कह गयी मुस्कुरा के। 
बेटी है तू, बेटी है तू, बेटी है तू,   


                                                                           लेखक :- आकाश दास  
                                                                  

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